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vkumar


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बोलें तो बहन जी, दाग अच्छे हैं

Posted On: 18 May, 2010  
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ब्यूटीफुल सुनंदा, दिल मांगे आईपीएल

Posted On: 14 Apr, 2010  
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आएशा सिद्दीकी को सलाम

Posted On: 8 Apr, 2010  
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सानिया की शादी के लड्डू

Posted On: 2 Apr, 2010  
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गुड़ खाएं और गुलगुले से परहेज

Posted On: 29 Mar, 2010  
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आईपीएल, खेल का चोखा धंधा

Posted On: 22 Mar, 2010  
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माला नहीं, पढ़ें मानसिकता

Posted On: 19 Mar, 2010  
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माया की माला और मनगढ़ के पीड़ित

Posted On: 16 Mar, 2010  
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महंगाई में चीनी कम

Posted On: 8 Feb, 2010  
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नेताओं की काली कमाई जब्त करने का कानून बने

Posted On: 1 Feb, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

संदीप राऊजी , आपने आवेग में आके मुद्दों का घालमेल कर दिया है. सानिया का विरोध कोई इसलिए नहीं कर रहा कि वह अल्पसंख्य समुदाय की है. यह कुटिल और धूर्त राजनीती करने वाले हैं जो अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की बात करते हैं. सानिया हो या कोई और यदि वह किसी अन्य लडकी का घर तोड़ कर अपना घर आबाद करे तो क्या आप उसे प्रश्रय देंगे. यह बात तो सर्वदा निंदनीय है. फिर मोदी को इसमें घसीटने की जरूरत नहीं क्योंकि वह मसला ही अलग है. एनडी तिवारी, इच्छाधारी बाबा, नित्यानंद स्वामी, आरएस राठौड़ आदि का मामला भोगियों का है और इन सबने तमाम रंडियों को भोगा है जो पैसे के लिए कुछ भी करवा सकती हैं. इसलिए इसे भी यहाँ लाने की क्या जरूरत थी. आपने लिखा है कि दुश्मनी का अफीम देकर जनता को मूर्ख बनाने का शगल पुराना हो चुका है, कुछ नया सोचिए। यह काठ की हांड़ी बार बार नहीं परवान चढ़ने वाली. शायद आप को पाकिस्तान पृष्ठभूमि और कठमुल्लों की मानसिकता का अधिक संज्ञान नहीं है जिनकी राजनीति बिना भारत विरोध के नहीं चमक पाती. पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था कलुषित कर दी गयी है और मदरसा पद्धति में केवल कट्टरता सिखा रहे हैं जो अधिकांशतः भारत और अन्य धर्मों के विरोध और उन्हें समाप्त करने पर आधृत होता है. आम भारतीय तो कभी भी किसी से विरोध नहीं रखता किन्तु जब बार बार भारत पर हमले होते रहे हों तब आप जैसे लोग जो कुछ तो सोच-समझ कर और कुछ नादानी में ऐसी बातें कर माहौल ख़राब करते हैं.

के द्वारा:

अल्‍पसंख्‍यकों की भलाई का झूठा थका हुआ गाना गाने वाले कामरेड संदीप राउजी जीवन भर यही गाते रहेंगे कि बहुसंख्‍यक बडे खराब हैं और अल्‍पसंख्‍यक इनके सगे। अमेरिका विरोधी और फिर मोदी विरोधी मानसिकता में जीने वाले कामरेडी टुटपुंजियों को सबसे पहले गाजा पटटी की तरह पाकिस्‍तान में बसा देना चाहिए, अब हमें आतंकवादियों, पाकिस्‍तान, ईरान, ईराक, चीन और अफगानिस्‍तान से डरने की जरूरत नहीं है, हमें तो सबसे ज्‍यादा खतरा घर में घुसे इन कामरेडियों से है जो रहते यहां का गाते चाइना का हैं और खाते पाकिस्‍तान का हैं, यह कहते है भारत के कई शहरों के कई खास इलाकों का नाम पाकिस्‍तान रखकर उन्‍हें बदनाम किया जाता है, मिस्‍टर राउजी कभी वहां रहने का साहस जुटाइये लेकन वह माददा तो कामरेडों में होता नहीं, गोधरा दंगों में मारे गए लोगों के लिए फातिया पढने वाले आप जैसे लोगों ने कभी उससे ठीक पहले गोधरा टेन में मारे गए लोगों के लिए दबी जुबान से भी कुछ नहीं कहा होगा क्‍योंकि वह मुसलमान नहीं थे, तीस्‍ता शीतलवाड के रिश्‍तेदारों कभी तुमने कश्‍मीर में मारे जा रहे और वहां से बेघर किए जा रहे कश्‍मीरी पंडितो के लिए आवाज उठाने का सहास नहीं किया, आपके जैसे दोहरे चरि.वाले तथाकथित सेक्‍युलरों की सेक्‍युलरिटी यहां जाकर मर जाती है, मैं यह नहीं कहता कि सभी मुसलमान खराब हैं लेकिन आप जैसे कामरेड जरूर इस देश के लिए नासूर हैं, आपको आदत है देश में रहकर देश विरोधी बाते करने की, यह हमारे देश की महानता है कि आप जैसे लोगों को तब भी भारत की नागरिकता दी गई है अगर चीन में होते तो तमाम चीनियों की तरह देश के खिलाफ एक शब्‍द कहने पर भी जीवन भर जेल में सडते यहां ढाढी बढाकर गरीब बेरोजगारों को बेफालतू के उपदेश न देते फिरते, कामरेडों ने कानपुर की मीलें बंद कर दी, पश्‍िचम बंगाल के कारखानों में ताले डलवा दिए और बांटने लगे बेरोजगारी भत्‍ता, आप जैसे देश विरोधी लोगों के कारण ही भारत पहले मुसलमानों और फिर ईसाइयों का गुलाम रहा, हमने तो गुलामी छोड दी लेकिन अभी आपको आदत बनी हुई है तभी आप अभी तक सेक्‍युलिरटी का गाना गाते घूम रहे हो, कामरेडों का काम है पहले अमेरिका का विरोध करना फिर देश का विरोध करना, उसके बाद पश्‍िचम बंगाल और केरल को छोडकर बाकी राज्‍यों का विरोध करना और कोई न मिले तो अपने बाप का विरोध करना, संदीप जी संभल जाइये कहीं आपको देश के बाहर न जाना पडे

के द्वारा:

मेरा बस चले तो संदीप राउजी आपको ही पाकिस्‍तान भेज दूं क्‍योंकि आप जैसी मानसिकता वालों ने ही देश को 1000 साल से ज्‍यादा कभी मुसलमानों तो कभी ईसाइयों का गुलाम बना रखा, आप जैसे लोगों को इनकी गुलामी में रहने की आदत हो गई है, कटटरपंथी और दोहरे चरि.वाले तो आप और आपके कामरेड हैं जो बात बात पर अमेरिका का विरोध करने लगते हैं, देश में इंपार्टेंस नहीं मिली तो देश विरोधी बात करके और छदम सेक्‍युलर बनकर थोडी सी ढाढी बढाकर निकल पडे प्रवचन करने, काम में मन नहीं लगता तो कानपुर की मील बंद करवा दीं, पश्‍िचम बंगाल में सारे कारखानों में ताला डलवा दिया और बांटने लगे बेरोजगारी भत्‍ता, आप सच कह रहे हैं पाकिस्‍तान से ज्‍यादा हमें आप जैसे लोगों से बचने की जरूरत है जो देश में रहकर ही यहां की काट करते हैं, नक्‍सलवादियों और आतंकवादियों से पहले आप जैसे लोगों के खिलाफ अभियान चलाया जाना चाहिये जो देश को बर्बाद करने में जुटे हुए हैं, तुम जैसे लो गोधरा दंगे में मरे हुए लोगों के पक्ष में तो खडे हो जाते हो लेकिन गोधरा टेन में जो मारे गए थे उनके पक्ष में खडे होने में तुम्‍हारी टांगे जवाब दे जाती हैं, अरे तथाकथित सेक्‍युलर डामेबाज कभी कश्‍मीरी पंडितों के पक्ष में खडे होने का दम दिखाया, तुम लोग ढोंगी हो जिन्‍हें सिर्फ और सिर्फ ढोंग करना आता है, बहुत बडे सेक्‍युलर होने का मतलब यह नहीं कि मुसलमानों के लिए ही फातिया पढो, सेक्‍युलर होने का मतलब है हर धर्म के लिए लडो जो माददा तुममे और तुम्‍हारी पूरी बिरादरी में किसी के पास नहीं है, तुमने कहा कि इस देश के कुछ शहरों के कुछ खास इलाकों को पाकिस्‍तान के नाम से बदनाम किया जाता है तो तुम्‍हें वहां जाकर रहना चाहिए फिर तुम्‍हें पता चल जाएगा कि वस्‍तुस्‍िथति क्‍या है लेकिन तुम ऐसा कर नहीं सकते क्‍योंकि कामरेडों के पास यह माददा तो कभी था ही नहीं, अपने बुधदेव, अच्‍युतानंद और करात दंपित को देखो जो केरल और पश्‍िचम बंगाल में विदेशी निवेश के लिए दलालों की तरह घूमा करते हैं और देश में विनिवेश मं.ालय बनता है तो उसके विरोध में खडे हो जाते हैं, कामरेडों का काम सिर्फ विरोध करना है, पहले अमेरिका का, फिर देश का, उसके बाद पश्‍िचम बंगाल और केरल को छोडकर बाकी राज्‍यों का और कोई न मिले तो अपने बाप का, समझ गए राउजी बदल दो अपनी राय

के द्वारा:

अभिषेक साहब भारत और पाकिस्तान को अनंतकाल तक दो दुश्मन देश मानने वाले आज देश को ही खंड खंड में बांटने पर तुले हुए हैं। इस दुश्मनी के चोले में छिपे खंजरों पर हर साल जनता की गाढ़ी कमाई का कितना अरब डालर स्वाहा हो जाता है शायद आप जैसे लोगों को इसका अंदाजा नहीं है। जिस गंदी नीयत की आप बात कर रहे हैं वह बाहर ही नहीं घर में भी हो सकती है और इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि एक कट्टरपंथी तबका यही चाहता है। कहीं इसीलिए तो नहीं हर शहर में कुछ खास इलाकों का नामकरण पाकिस्तान के नाम से प्रचारित करने का षणयंत्र रचा जा रहा है। दुश्मनी का अफीम देकर जनता को मूर्ख बनाने का शगल पुराना हो चुका है, कुछ नया सोचिए। यह काठ की हांड़ी बार बार नहीं परवान चढ़ने वाली। एनडी तिवारी, इच्छाधारी बाबा, नित्यानंद स्वामी, आरएस राठौड़ आदि आदि अपनी इस उम्र तक कितनी युवतियों के दिल में खंजर भोंक चुके हैं क्या आप उन्हें पाकिस्तान भेजने की मांग नहीं करेंगे। लेकिन आपको सानिया के इश्क पर ऐतराज है। क्योंकि वह अल्पसंख्यक है और यहां के बहुसंख्यक चाहते हैं कि अब अल्पसंख्यकों के प्यार का फैसला भी वे ही करें। जीने की शर्त तो पहले ही तय कर दी है मोदी ने। यह अंधेर है महा अंधेर।

के द्वारा:

पहली बात तो यह िक अब भारत और पािकस्‍तान दो दुश्‍मन देश हैं जो मान लेने में ही भलाई है, 1947 से पहले वाली स्‍िथतियां अब नहीं हैं, न अब अमृतसर के लोग हाट बाजार करने लाहौर जाते हैं और न ही दिल्ली– मुंबई के लोग इस्लामाबाद और कराची से ब्याह कर दुल्हनें लाते हैं, सीमा रेखाएं दिलों को पूरी तरह से बांटती हैं, जब एक घर में बंटवारा होता है तो दो भाइयों के बीच दरार हो जाती है यहां तो देश के बंटवारे की बात है, इसके बावजूद पाकिस्‍तान से दोस्‍ती का हाथ बढाया जा सकता था लेकिन पचास साल से ज्‍यादा हो गए उसकी गंदी नीयत को देखते हुए इसलिए कम से कम मैं तो उससे दोस्‍ती करने की सलाह नहीं दूंगा, अब बात सानिया की, सानिया इस देश और यहां की नागरिकता का अपने लिए प्रयोग कर रही हैं, अंतरराष्‍टीय नियमों के हिसाब से सानिया जब तक तीन साल पाकिस्‍तान में नहीं रह लेतीं तब तक वहां से खेल नहीं सकतीं दिलावर चाहे जितनी भी डींगे हांकते रहें, यह बात सानिया को भली भांति पता और शायद दिलावर को भी, इससे पाक की एक नीयत और सामने आती है कि दिलावर ने रणनीतिक तौर पर यहा पांसा फेंका है जैसे गदर फिल्‍म में अमरीश पुरी, सनी देओल को मुसलमान धर्म ग्रहण करने की अनुमति के बाद भी हिंदुस्‍तान मुर्दाबाद का नारा लगाने के लिए कहता है, यह पाकिस्‍तान की नीयत है। सानिया ने शादी से पहले ही बेवकूफ भारतीयों को एक लॉलीपॉप दिया कि मैं शादी भले ही पाकिस्‍तानी से कर रही हूं लेकिन 2012 ओलंपिक तक भारत की ओर से खेलूंगी। यह तो सानिया की मजबूरी है वह भारत के अलावा कहीं से नहीं खेल सकतीं और 2012 के बाद उनका कैरियर बचेगा नहीं। सानिया ने कहा, उनकी शादी एक निजी मामला है। मैं नहीं मानता, अगर ऐसा होता तो अभिषेक और एश्‍वर्या की शादी में मीडिया तमाम तरीके की खबरें चलाता। सानिया ने इस देश से बहुत कुछ लिया है और उसकी कीमत तो उन्‍हें चुकानी ही पडेगी। हजारों खिलाडी अच्‍छा प्रदर्शन करने के बाद भी इतना प्रचार नहीं पा सकीं जितना मीडिया ने कुछ न करने के बावजूद सानिया को दिया।  अंदर की खबर यह है कि सानिया ने देश के ही नहीं अपनी दोस्‍त आयशा के दिल पर खंजर भोंका है। शोएब मलिक ने पहले आयशा से शादी की और बाद में उनकी दोस्‍त्‍ा सानिया से शादी कर रहा है। यह भी पाकिस्‍तानियों की नीयत और भारतीयों की बेवकूफी का जीता'जागता उदाहरण है। अगर पाकिस्‍तानी इस बात पर राजनीति न कर रहे होते तो उनके देश में इस फैसले के बाद ढोल नगाढे न बचते, यह सब दिखाता है कि अब भी वक्‍त है रीना राय और कारगिल जैसे मुददों का न भूलते हुए पाकिस्‍तानी मानसिकता और भारत के सेक्‍युलर लोगों की देश विरोधी मानसिकता से भारत को बचाया जाए।

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एक सवाल उपजता है- क्या बिग बी का कांग्रेस सम्मान कर दे तो उसकी बाकी फासीवादी और तानाशाही हरकतों को माफ कर दिया जाएगा। इस मुद्दे को अखबार मानो इसी तरह उछाल रहे हैं कि जैसे कांग्रेस संवेदनशील पार्टी है और उसने ऐसा कर या वैसा कर अपनी परंपरा को तोड़ा है। कांग्रेस ने जो किया है उससे वही अपेक्षा की जा सकती थी।    हलांकि यह मामला दो फासीवादी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बीच का ज्यादा लगता है। जिसमें मोहरा बिग बी बने। मोदी पर बढ़ते शिकंजे के बीच कांग्रेस भाजपा को उबरने का कोई भी मौका नहीं देना चाहती इसलिए वह कोई भी हो जो मोदी को सहलाएगा कांग्रेस उसी के कंधे से मोदी पर गोले छोड़ेगी ही छोड़ेगी।

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देस के लखो मंदिरो मे अरबो रुपये का चढ़वा डेली होता है. और वा कान्हा जाता है किसी को कुछ पता नही चलता. और उसके लिए कभी टॅक्स भी नही लिया जाता है. क्या मंदिरो की आय पर टॅक्स नही लगना चाहिए. ? सबसे बड़ी बात वान्हा पैसा चढ़ाया ही क्यूँ जाता है. और वा भी उन पठार की मूर्तियो पर जो की काल्पनिक है मायजी तो जीती जागती देवी है. जिन्होने ग़रीबो को नया जीवन दिया है. जो की अपने है देश मे उपेक्षित थे. देस के सारे मंदिरो को बदलकर स्कूल, अस्पताल, और लोगो के ज़रूरी स्थान बना देना चाहिए. मंदिरो की कोई ज़रूरत नही है. जो एक ज़रिया है पैसा कमाने का. ह्यूम अच्छे कर्म करने चाहिए जो की देश हिट मे हो. मायावती जी वा सब कर रही है जो देश के लिए ज़रूरी है. हम बीक्सित देश तभी बन पाएँगे जब देश का हर नागरिक समान होगा. और सभी सिक्षित होंगे. सब को बराबर का हक हो. कोई उँचू नीच ना हो. सब को बराबर का जीने का हक है.

के द्वारा:

आज कल हाथी चुनाव चिन्ह को लेकर लोग ज़हीत याचकाय दायर कर रहे है. साइकल और हाथ के खिलाफ क्यूँ नही कर रहे है हाथ लेखार सब गुम्ते है सबके हाथ ही काट जाने चाहिए सब साइकल चलते है उस पर बैन लगना चाहिए क्यूंकी वो सब चुनाव चिंग का ग़लत प्रचार कर रहे है मिसयूज़ कर रहे है.मंदिरो के बाहर और बड़े बड़े धार्मिक कामो मे हाथी को स्वागत के रूप में पेस किया जाता है. अंबेडकर स्मारक में भी हाथियों का प्रयोग स्वागत के रूप मई किया गया है जिसमे हाथियों की ज़्ड ओपर की ओर है जबकि चुनाव चिन्ह मे नीचे की ओर है इतने जल्दी सबको चुनाव चिन्ह सताने लगा है. हाथ और साइकल के चुनाव चिन्ह एकदम कॉपी है उनके ग़लत प्रचार प्र बैन लगना चाहिए. दोनो के चुनाव चिंग ज़ॅप्ट होने चाहिए.

के द्वारा:

मैं अभी पूर्वांचल के गांवों में घूम कर आया हूं। वहां हर दो चार कोस पर हरिजनों के लिए मल्टी स्टोरीज फ्लैट बन रहे हैं (अधिकांश तो बन कर तैयार हैं) और इन फ्लैट्स को देखकर बाबू लोगों को इर्ष्या हो रही कि हंः देखों जरा उन भुच्चड़ों के लिए रंगीन फ्लैट सरकार बना कर दे रही है जिन्हें झोपड़ी में ही रहने का सलीका नहीं है। बाबू का तर्क है- 10 बाई 10 के दो कमरों में उनका क्या भला होगा जिनके परिवार में ही पांच से 10 लोग हैं और आखिर बकरियां, सूअर, गाय व बैल वे कहां रखेंगे. बाबू लोग कहते हैं कि मायावती ने सिर्फ मूर्तियों और पार्कों पर सारा खजाना खाली कर दिया जब उनसे कहो भाई उसने गरीबों को फ्लैट बनवा कर भी तो दिए तो वे कहेंगे वे फ्लैट किस काम के जो जिनमें उनकी बकरियां भी न आवें। आप ही बतावें मायावती वर्तमान राजनीतिज्ञों में क्यों बुरा हैं. पचास साल में किन पार्टियों ने दलितों के लिए फ्लैट बनवाए.  कितने दलित महापुरुषों के स्मारक बनवाए. कितने सवर्ण दबंगों को जेल भेजा. हां मायावती कुछ मामलों में फासिस्ट सत्ता की ओर अग्रसर है और वह भारतीय राजनीति के केंद्रीय तत्व-तानाशाही से अछूती नहीं है। यूपी की जनता के आगे कुआं पीछे खाई है। जाए तो जाए किधर।  

के द्वारा:

आज हम जगा जाहाः मंदिर का निर्माण कर रहे है और लाखों म्ण्दिर पहलेब से बने हुए है. जिन पर अराबो रुपया खर्च हुआ है और हो रहा है. क्या वा पैसा ग़रीबों का नही होता है क्या ज़रूरत है ह्यूम मंदिर बनाने की जो सिर्फ़ एक ज़रिया है पैसा कमाने का कुछ खास लोगो के लिए. और उसमे जो भी प्पैसा आता है वो भी लाखों अराबो रुपये उस पैसे का क्या होता है मंदिर बनाने के बजे हम स्कूल अस्पताल डिग्री कॉलेज और भी इंसानो के लिए ज़रूरी चीज़े क्यूँ नही बनाते है. हम जाती धर्म का बँधा क्यूँ नाहो तोड़ राहेब है कोई ठाकुर कोई प्पांडित क्यूँ है जबकि सब इंसान समान है . हम मानव और हमारा धर्म मानवता क्यूँ नही है. देश में एक धर्म ऐसा भी होना चाहिए जो किसी धर्म को न माने सिर मानव और मानवता ही सब कुछ होना चाहिए. अमिताभ का मंदिर बन सकता है तो मायावतीजी का क्यूँ नही मूर्तिया तो शृुख ख़ान सलमान सचिन और ना जाने किसकी लगी हुई है और सब जिविवत् व्ही तो मवावाती जी की क्यूँ नही लग सकती.

के द्वारा:

गरीबों के लिए धन नहीं था तो ३००० करोड़ के स्मारक कहाँ से आये क्या ये भी चंदे से थे...... मै एक सरकारी विभाग़ में हूँ और मुझे पता है ये चंदा कहाँ से आता है........ मुंह मत खुलवाइए ..... मैंने तो कभी नहीं देखा कि गावों में चंदा इकठ्ठा किया जाता हो इस नाम पर बल्कि ये ज़रूर देखा है कि सरकारी और प्राइवेट बसों को पकड़ पकड़ कर और सौ सौ रूपये दे कर लोगों को इकठ्ठा किया गया और लखनऊ की रैली में ले जाया गया..... और ये व्यवस्था क्षेत्रीय नेता के हाथ में होती है और उसके द्वारा लाई गयी जनता के हिसाब से ही उसके नंबर मिलते हैं...सरकारी विभागों में आज परसेंटेज तय कर दिया जाता है जिसे फंड रिलीज़ करने से पहले ही काट लिया जाता है ........ये है चंदा जिसे गरीबों से लिया हुआ दिखाया जाता है .... बस ये समझिए मनीराम की लूट है लूट सके तो लूट, एक दिन ऐसा आयगा कुर्सी जाए छूट ........लग

के द्वारा: padmsingh padmsingh

padmsingh के द्वारा March 18, 2010 मायावती जी की गलती नहीं है वो दौलत के नशे में अंधी हो गयी हैं, उन्हें कुछ नहीं दिखाई दे रहा है, न क़ानून, न नियम, और न कर्तव्य… ऐसे कई गरीबों को मै जानता हूँ जिनके पास एक बिस्वा ज़मीन नहीं है, रोटी खाने के लाले पड़े हैं और उन्ही के परिवार के जो लोग चालाक और सक्षम हैं वो ही सब योजनाओं का मज़ा ले रहे हैं… तो मायावती को दौलत के अलावा, सत्ता के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है… उन्हें गरीबों और दलितों से कोई मतलब नहीं है , उनका पैसा तो स्विस बैंक में ठूंसा जा रहा है …ये पैसा मासूम गरीबों की कमाई है जिसे लूट लूट कर विदेशी बैंकों में भरा जा रहा है ......करोडो की माला धन पशु ही साबित करती है और सभ्यता का परिचायक नहीं है ...... और दुबारा पैसे की माला पहन कर अपनी उजड्डता, हेकड़ी और ढीठता का ही परिचय दिया है, अभी आप जैसे उनके अनुयायी बहुत भोले हैं यही कारण है कि मायावती की हकीकत नहीं जान पा रहे हैं…दलितों और गरीबों से सब को हमदर्दी हो सकती है और है भी, किन्तु ऐसा दंभ तो टूटता है और टूटेगा…. अगला चुनाव आने दीजिए

के द्वारा: padmsingh padmsingh

मायावती जी की गलती नहीं है वो दौलत के नशे में अंधी हो गयी हैं, उन्हें कुछ नहीं दिखाई दे रहा है, न क़ानून, न नियम, और न कर्तव्य... ऐसे कई गरीबों को मै जानता हूँ जिनके पास एक बिस्वा ज़मीन नहीं है, रोटी खाने के लाले पड़े हैं और उन्ही के परिवार के जो लोग चालाक और सक्षम हैं वो ही सब योजनाओं का मज़ा ले रहे हैं... तो मायावती को दौलत के अलावा, सत्ता के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है... उन्हें गरीबों और दलितों से कोई मतलब नहीं है , उनका पैसा तो स्विस बैंक में ठूंसा जा रहा है .... और दुबारा पैसे की माला पहन कर अपनी उजड्डता, हेकड़ी और ढीठता का ही परिचय दिया है, अभी आप जैसे उनके अनुयायी बहुत भोले हैं यही कारण है कि मायावती की हकीकत नहीं जान पा रहे हैं...दलितों और गरीबों से सब को हमदर्दी हो सकती है और है भी, किन्तु ऐसा दंभ तो टूटता है और टूटेगा.... अगला चुनाव आने दीजिए

के द्वारा: padmsingh padmsingh

मई कोई मायजी का भक्त नही हूँ और ना ही कोई उपकर मायजी ने मेरे लिया किया है. अगर सच देखना चाहते हो तो ६० साल पिच्चे चले जाओ सब समझ मे आ जाएगा. इस देश मे जान्हा दलितों को इंसान नही समझा जाता है. उन पर इतने अत्याचार हुए है आप कल्पना भी नही कर सकते है. आख़िर दलित भी इसी देश के निवासी है. उन्हे इतने घ्रना से क्यूँ देखा जाता है. ऐसे अत्याचार जिनको सुन के आपकी रूह काँप जाएगी. ज़रा इतिहास पाडीए. जिन्हे पड़ने अच्छे कपड़े पहनने अच्छा खाने और धार्मिक बात सुनने पर पाबंदी थी अगर ऐसा कर लिया तो जान से गये. या अंधे काने बहारे बना दिए गये. आख़िर क्यूँ. आज अगर एस दलित समाज को समान मिला है ती इसका श्रेया डाक्टर अंबेडकर कांशीराम और मायावती जी को जाता है. हुमारे देश के लोगो ने लाखों सालों से दलितों पर अत्याचार किए है और कर रहे है आख़िर क्यूँ इन्हे बराबरी से जीने का हक नही है. आज अगर समाज मे परिवर्तन आया है तो मायजी की वजह से. देश विकास तभी करेगा जब सब बिकस करेंगें आज मायजी वही कर रही है.

के द्वारा:

भाई साहब पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार कहीं से भी वामपंथी नहीं रह गई है। हां कभी भूमि सुधार का काम कर जनता की सहानुभूति बटोर ली थी उसी की पूंजी 30 साल तक चली। अब वह खत्म हो गई है और उसे वहां की जनता सजा भी दे रही है। माओवादी उनकी नाक में दम किए हुए हैं। सिंगूर, नंदीग्राम उनकी ताबूत में अंतिम कील ठोंक रहे हैं। सवाल यह है कि देश की पूरी राजनीति की दिशा तानाशाही की ओर जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि जनता के पास विकल्प बचा है तो सिर्फ यही कि हम इस तानाशाह को चुनें कि उस तानाशाह को। आप क्या समझते हैं ममता जब आएंगी तो बुद्धदेव की तानाशाही से कम चाबुक चलाएंगी। मुझे उम्मीद है कि चुनाव बाद आपको इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।

के द्वारा:

.भाई साहब पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार कहीं से भी वामपंथी नहीं रह गई है। हां कभी भूमि सुधार का काम कर जनता की सहानुभूति बटोर ली थी उसी की पूंजी 30 साल तक चली। अब वह खत्म हो गई है और उसे वहां की जनता सजा भी दे रही है। माओवादी उनकी नाक में दम किए हुए हैं। सिंगूर, नंदीग्राम उनकी ताबूत में अंतिम कील ठोंक रहे हैं। सवाल यह है कि देश की पूरी राजनीति की दिशा तानाशाही की ओर जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि जनता के पास विकल्प बचा है तो सिर्फ यही कि हम इस तानाशाह को चुनें कि उस तानाशाह को। आप क्या समझते हैं ममता जब आएंगी तो बुद्धदेव की तानाशाही से कम चाबुक चलाएंगी। मुझे उम्मीद है कि चुनाव बाद आपको इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।

के द्वारा:

मनगढ़ पीड़ितों को माया की माला से जोड़ना कहां तक सही है जबकि यह एक पार्टी का कार्यक्रम है और कथित रूप से कार्यकर्ताओं ने दान दिए हैं। क्या लालजी टंडन और कल्याण सिंह को सोने से नहीं तौला गया या इसी तरह दक्षिण के नेता भी सोने चांदी से नहीं तौले जाते हैं। उन पर तो इतना बवाल नहीं होता है। असल में यह लड़ाई कुल तानाशाहों में से एक को चुनने का है। आप फला तानाशाह को अच्छा मानते हैं और वह फलां तानाशाह को. लेकिन मैं मानता हूं कि हमें इन तानाशाहों की जंग में शरीक होने की बजाय जनता की आवाज बुलंद करनी चाहिए। हालांकि मैं मनगढ़ पीड़ितों के प्रति पूरी तरह सहानूभूति रखता हूं। मैंने पहले भी कहा कि मायावती भी उन्हीं तानाशाही प्रवृत्तियों का शिकार हैं जिनसे अन्य भारतीय राजनीतिज्ञ और संगठन। और तानाशाह तो तानाशाह है। क्या यही तानाशाही प्रवृत्तियां गांधी परिवार की कांग्रेस में नहीं दिखतीं जिनके पारिवारिक सदस्यों के नाम देश भर में हजारों स्मारक, स्कूल, विश्वविद्यालय, सड़कें, पार्क बने हुए हैं। यहां संघ के दीन दयाल उपाध्याय और हेडगेवार के नाम पर सड़कें, अस्पताल और पार्क नहीं बने हुए हैं। इन पहलुओं पर मीडिया और लोगों की चुप्पी क्यों है।  

के द्वारा:

ये संदीप राउजी क्‍या बेचते हैं। इन्‍होंने कइओं के नाम लिखे लेकिन किसी वामपंथी नेता का नाम नहीं है। क्‍या इन पंक्तियों के लेखक वामपंथ की दुकान चलाते हैं। मायावती से अगर किसी की तुलना की जा सकती है तो वह हैं पश्चिम बंगाल के सीएम बुद़धदेव भट़टाचार्य। मनगढ की तरह पश्चिम बंगाल में कई घटनाएं होती रहती हैं। दो दिन पहले लोकसभा में एक माननीय ने जानकारी दी कि जहरीली शराब से देश में सबसे ज्‍यादा मौतें पश्चिम बंगाल में ही होती है। लेकिन यहां की सरकार आंखें मूंद कर सोती रहती हैत। यही नहीं जहां तक तानाशाह प्रशासक की बात है तो वामपंथियों ने वहां सबसे ज्‍यादा तानाशाही रवैया  अपनाया है।

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लेख की शैली वाकई बहुत पसंद आई। यह लेख एक तरफ हमें सोचने पर मजबूर कर देता है कि जनता से उठकर कोई व्यक्तिवादी कैसे तानाशाह हो जाता है वहीं दूसरी तरफ यह लेख हमारी चेतना को भी झिंझोड़ता है कि कैसे हम इतिहास के सबकों को भूल गए हैं। हिटलर की बात बहुत पुरानी नहीं हुई है। वह भी कभी जनता का आदमी था, ट्रेडयूनियनों का अगुआ था। जब वह शासक बना तो अपने असली चरित्र पर आ गया। क्या आपको नहीं लगता कि देश में मायावती, जयललिता, ममता बनर्जी, मुलायम, लालू यादव, मोदी, चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार,  चिदंबरम क्या इसी रास्ते नहीं चल रहे हैं. व्यक्तिगत राजनीति की यही परिणति है। यही काम संघ और कांग्रेस संगठित रूप से कर रह हैं। मुझे उपरोक्त सभी व्यक्तिगत और संगठन उसी तानाशाही की ओर जाते हुए दिख रहे हैं। देश एक आर्थिक तानाशाही की ओर बढ़ रहा है और पूरा तंत्र व्यक्तिगत पूंजी की सुरक्षा के लिए जनता की छाती पर बंदूक ताने हुए हैं। मायावती भी उन्हीं में से एक है। मायावती एक तानाशाह है इस बात का एक सबूत यह भी है कि इसी सरकार के नेतृत्व में दलित संगठनों को माओवादी करार दिया गया है। सोनभद्र, मिर्जापुर, इलाहबाद, चित्रकूट के दलितों की जमीनें कब्जाने के लिए उन्हें माओवादी और नक्सली बातकर जेल भेजा जा रहा है। यह सब दलितों की बेटी ही कर रही है।

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आज मायजी की माला पर इतना हॉल हो रहा है जैसे बाकी सब सारीफ़ है. आज लोग मायजी की प्रसीधी से इतना दर गये है. जिसका कोई जवाब� नही. आज अगर मेरे पास इतना धन होता तो मे मायावतीजी का इतना भव्या मंदिर बनवाता जैसा आज तक किसी देवी या देवता का नही बना होगा. एक दिन ज़रूर बाँवौनगा. सब दलित बीरोधी मानसिकता के लोग मायावतीजी के खिलाफ हो गये है. सारा धन कार्यकरताऊ के द्वारा जुटाया गया. देश मा एटने लोग है अगर एक रुपया भी देंगे तो करोरो इकाता हो जाएगा. सारे देश के लोगो ने पैसा दिया है जो भी दलित बीरोधी नही है.� पुराने नेताओ ने इतना देश को लूटा है जिसका कोई हिसाब नही है. कभी उनसे भी पुंच्छो उनके पास इतना पैसा कान्हा से आया. मंदिरो मे इतना दान आता है कभी उसका भी टॅक्स ले लिया करो. मंदिरो मे अराबो की कमाई डेली होती है जिसका कोई हिसाब नही है. कभी वान्हा भी इंकों टॅक्स वेल जाके पता करने का कास्ट करे पैसा कानहासे आता है� और उसका क्या होता है. मेरा लेख मत काटीएगा संपादक महोदैजी. आपसे� बिनाम्रा अनुरोध है. हमारे देश मे लाखों मंदिर है जिनमे अरबों रुपये का चदवा डेली आता है. उस पैसे का क्या होता कान्हा जाता है वो पैसा और किसकी मेहनत का होता है. आज मायावतीजी को भेंट की गयी माला जो की डेस्क के लाखों करकर्ताओ के द्वारा भेंट की गयी है. उसपे इतना हे हल्ला क्यूँ हो रहा है. सारे बीरोधी दल मायजी की शक्ति से घबरा गये है. आज अगर मेरे पास इतना धन होता तो मई मायावतीजी का इतना भव्या मंदिर बनावता जैसा आज तक नही बना होगा. कभी ना कभी तो ज़रूर बनवावँगा. आप सकच्छत देवी का रूप लेकर आवत्वरित हुई है. आप भगवान से भी बदकार है. ग़रीब समाज को आप पर गर्व रहेगा.

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